Soyabean ki kheti-सोयाबीन की खेती

सोयाबीन की खेती कैसे करें? पूरी जानकारी गाइड

भारत में सोयाबीन की खेती (Soyabean ki kheti) किसानों के लिए लाभदायक फसल मानी जाती है। यह खरीफ की प्रमुख तिलहनी फसल है जिसे ”सोयाबीन  की फसल  ” भी कहा जाता है। इसमें 40-45% तक प्रोटीन और 18-20% तक तेल पाया जाता है। और  सोयाबीन का उपयोग खाने  तथा तेल, पशु आहार, सोया दूध, सोया पनीर (टोफू) और विभिन्न उद्योगों में किया जाता है।

 

आइए जानते हैं Soyabean farming in India की पूरी गाइड-

soyabean ki kheti (soyabean)

soyabean ki keti (soyabean beej)

1. सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु (Climate for Soyabean Farming)

  • सोयाबीन की फसल के लिए गर्मी और नमी वाला मौसम अच्छा होता है।

  • इसे 20°C से 35°C तक का तापमान चाहिए।

  • यह फसल बरसात (खरीफ सीजन) में बोई जाती है।

  • 700–1200 मिमी तक वर्षा सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक है।

2. मिट्टी का चुनाव (Soil Requirement for Soyabean)

  • सोयाबीन की खेती दोमट या काली मिट्टी में अच्छी पैदावार होती है।

  • pH मान 6.0 से 7.5 तक उपयुक्त है।

  • पानी की निकासी वाली भूमि बेहतर होती  है क्योंकि पानी रुकने  से बीज खराब हो जाते हैं।

  • खेत की जुताई 2–3 बार करले ताकि मिट्टी  भुरभुरी और समतल होजाये |

3. बीज की किस्में (Soyabean Beej ki Kisam)

भारत में कई उच्च उपज देने वाली किस्में उपलब्ध हैं:

  • JS 335 – सर्वाधिक लोकप्रिय, उच्च उत्पादन क्षमता वाली।

  • JS 93-05 – मध्यम अवधि की किस्म।

  • NRC 37 (Ahilya-4) – रोग प्रतिरोधी।

  • MAUS 71, MAUS 158 – महाराष्ट्र में लोकप्रिय।

👉 बीज की किस्म क्षेत्र और जलवायु के अनुसार चुनना चाहिए।

soyabean ki kheti soyabean beej prakar
soyabean ki keti (soyabean beej)
soyabean ki kheti a colorful bowl on a marble
soyabean ki kheti Close-up of scattered

4. बीज की बुआई का समय और विधि (Soyabean Beej Buaai)

  • बुआई का समय: जून के मध्य से जुलाई का पहला सप्ताह (मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद) बुआई  का अच्छा समय होता है 

  • बीज की मात्रा:

    • देसी किस्म के लिए – 70-80 किलो/हेक्टेयर

    • संकर किस्म के लिए – 80-100 किलो/हेक्टेयर

  • गहराई: 3-4 सेमी मिट्टी में बोना चाहिए।

  • दूरी: कतार से कतार 30-35 सेमी और पौधे से पौधे 5-7 सेमी। होनी चाहिए 

 बीज को बुवाई से पहले राइजोबियम और पीएसबी कल्चर से उपचारित करना चाहिए ताकि नाइट्रोजन स्थिरीकरण और अंकुरण अच्छा हो।

5. खाद और उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer for Soyabean Farming)

  • गोबर की सड़ी खाद (FYM) – 10-15 टन/हेक्टेयर

  • रासायनिक उर्वरक (NPK अनुपात):

    • नाइट्रोजन (20-30 किलो)

    • फॉस्फोरस (60-80 किलो)

    • पोटाश (40 किलो)

  • जिंक सल्फेट और सल्फर देने से दाने का विकास अच्छा होता है।

6. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation for Soyabean)

  • सोयाबीन वर्षा आधारित फसल है, परंतु सूखे की स्थिति में 2-3 सिंचाई करनी चाहिए।

  • खासकर फूल आने और दाना बनने के समय सिंचाई जरूर करना चाहिए |

7. खरपतवार नियंत्रण (Weed Control in Soyabean)

  • फसल के शुरुआती मे  40 दिन खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी है।

  • 2-3 बार खुरपी या हल्की गुड़ाई (नराई गुड़ाई ) करनी चाहिए।

  • आवश्यकता होने पर प्री-इमर्जेंस हर्बीसाइड (जैसे Pendimethalin) का उपयोग जरूर करें।

8. रोग और कीट नियंत्रण तथा रोक थाम (Soyabean Rog aur Keet)

  • रोग: पत्तों पर धब्बा, पीला मोजेक वायरस, जंग रोग।

  • कीट: तना छेदक, पत्ती खाने वाले कीड़े, गार्डन वेबवर्म।

  • नियंत्रण:

    • बीजोपचार कार्बेन्डाजिम/थायरम से करें।

    • रोग आने पर उचित फफूंदनाशक का छिड़काव करें।

    • कीट प्रकोप होने पर नीम का तेल या इमामेक्टिन बेंजोएट का छिड़काव  जरूर करें।

फसल की कटाई (Harvesting of Soyabean)

  • जब पत्तियाँ पीली होकर झड़ने लगें और फलियाँ भूरे रंग की हो जाएँ तब कटाई करनी चाहिए।

  • कटाई हाथ से या हार्वेस्टर मशीन से की जा सकती है।

  • कटाई के बाद 12-15% नमी पर अनाज को भंडारित करें।

10. उत्पादन और लाभ (Soyabean Upaj aur Fayde)

  • अच्छी किस्म और उचित देखभाल से 15-20 क्विंटल/हेक्टेयर उपज मिल सकती है।

  • उपज का तेल और पशु चारा उद्योग में बड़ा बाजार है।

  • किसान सोयाबीन प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर और भी अधिक लाभ कमा सकते है 

  • (soyabean ki kheti)सोयाबीन की खेती  से बहुत अच्छा लाभ काम सकते है 

निष्कर्ष

सोयाबीन की खेती (Soyabean ki kheti) आज किसानों के लिए कम लागत और अधिक मुनाफे वाली फसल है। यदि सही समय पर बुआई, उर्वरक प्रबंधन और रोग नियंत्रण किया जाए तो किसान प्रति हेक्टेयर अच्छी उपज लेकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं। बदलते समय में Soyabean farming in India को सरकार की योजनाओं और आधुनिक तकनीकों से और भी बढ़ावा मिल रहा है।

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